सुप्रीम कोर्ट ने इंफोसिस की अपील खारिज की, कन्नड़ अनुवाद का बहाना नहीं माना

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 2 सितंबर -भारत की शीर्ष आईटी कंपनी इंफोसिस लिमिटेड को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कंपनी की वह अपील खारिज कर दी जिसमें उसने मैसूर स्थित अपने कैंपस विस्तार के लिए अधिग्रहीत ज़मीन के मुआवज़े को चुनौती दी थी। अदालत ने साफ कहा कि कंपनी द्वारा दाखिल की गई अपील में 160 दिन से अधिक की देरी को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कन्नड़ अनुवाद का बहाना

इंफोसिस ने अदालत के सामने यह दलील दी कि अपील दाखिल करने में हुई देरी का कारण दस्तावेज़ों को कन्नड़ से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में लगा समय था। लेकिन न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।

न्यायमूर्ति दत्ता ने तीखा टिप्पणी करते हुए कहा— “इंफोसिस कह रही है कि उन्हें कन्नड़ से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में समय लगा? यह दलील अस्वीकार्य है। खारिज।”

इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने इंफोसिस की विलंब माफी याचिका खारिज कर दी और मामले पर आगे विचार करने से इनकार कर दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता की दलील भी अस्वीकार

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम नाडकर्णी ने इंफोसिस की ओर से पेश होते हुए आग्रह किया कि अदालत देरी के आधार पर याचिका को न ठुकराए और उन्हें नया हलफ़नामा दाखिल करने का अवसर दिया जाए। लेकिन पीठ ने इस निवेदन पर भी कोई सहानुभूति नहीं दिखाई और सीधे तौर पर इंकार कर दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2005 से जुड़ा है। उस समय कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड (KIADB) ने इंफोसिस कैंपस विस्तार परियोजना के लिए मैसूर जिले की कुल 18.04 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया था। इसमें से 1.05 एकड़ भूमि एक स्थानीय ज़मीन मालिक के परिवार की थी।

प्रारंभिक तौर पर विशेष भू-अधिग्रहण अधिकारी ने इस भूमि का मुआवज़ा 4.85 लाख रुपये प्रति एकड़ तय किया। लेकिन ज़मीन मालिक का परिवार इस मुआवज़े से असंतुष्ट रहा और 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 18 के तहत पुनः विचार का आवेदन किया।

मुआवज़े में भारी बढ़ोतरी

जनवरी 2020 में मैसूर की संदर्भ अदालत ने भूमि मालिकों की दलीलों को मानते हुए मुआवज़े में भारी बढ़ोतरी की। अदालत ने दर 220 रुपये प्रति वर्ग फुट तय की और साथ ही वैधानिक लाभ जैसे ब्याज और सोलाटियम भी देने का आदेश दिया।

इंफोसिस का हाईकोर्ट तक संघर्ष

इंफोसिस ने इस आदेश को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी का कहना था कि संदर्भ अदालत ने छोटे-छोटे प्लॉट्स की नीलामी और बिक्री के दस्तावेज़ों को आधार बनाकर बड़ी कृषि भूमि का मूल्यांकन किया, जो सही नहीं है।

इसके अलावा कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि जिस समय भूमि का अधिग्रहण हुआ, उस समय उसका कोई गैर-कृषि संभावित मूल्य नहीं था। फोटो और सैटेलाइट इमेज से यह साबित नहीं किया जा सकता कि भूमि का मूल्य इतना अधिक था।

भूमि मालिकों की दलील

दूसरी ओर, भूमि मालिकों ने दलील दी कि जिस ज़मीन का अधिग्रहण हुआ वह सीधे इंफोसिस कैंपस से सटी हुई थी और तेजी से औद्योगिक क्षेत्र में तब्दील हो रही थी। आसपास कई सॉफ्टवेयर और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां पहले से मौजूद थीं।

उन्होंने 2005 में हुए कई रेजिडेंशियल प्लॉट्स के बिक्री दस्तावेज़ पेश किए, जिनमें दर 430 से 499 रुपये प्रति वर्ग फुट तक दर्ज थी। भूमि मालिकों ने यह भी बताया कि वे अधिक मुआवज़े की मांग करने में असमर्थ रहे क्योंकि अदालत शुल्क भरने की स्थिति में नहीं थे। इसलिए उन्होंने 220 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर स्वीकार कर ली थी।

हाईकोर्ट का फैसला

22 अक्टूबर 2024 को कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ— न्यायमूर्ति श्रीनिवास हरीश कुमार और न्यायमूर्ति उमेश एम. अडिगा— ने इंफोसिस की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि उपलब्ध बिक्री के उदाहरणों और भूमि की स्थिति को देखते हुए 220 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर उचित ही नहीं बल्कि उससे अधिक भी हो सकती थी।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि जिस भूमि का अधिग्रहण हुआ, उसमें औद्योगिक और वाणिज्यिक संभावनाएं स्पष्ट रूप से मौजूद थीं, खासकर जब वह सीधे इंफोसिस के मौजूदा संचालन क्षेत्र से जुड़ी हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट में अंतिम झटका

हाईकोर्ट से निराश इंफोसिस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन अपील में देरी के कारण यह याचिका शुरुआत में ही खारिज कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न सिर्फ इंफोसिस बल्कि अन्य कॉर्पोरेट्स के लिए भी एक सख्त संदेश है कि प्रक्रिया संबंधी लापरवाही को किसी भी बहाने से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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