‘भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र, इसे घोषित नहीं करना’: मोहन भागवत

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  • मोहन भागवत ने कहा कि भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह पहले से ही है।
  • उन्होंने कहा कि ‘अखंड भारत’ सिर्फ एक राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सत्य है।
  • आरएसएस प्रमुख ने जोर देकर कहा कि भारत में सभी लोग, चाहे वे किसी भी धर्म को मानते हों, भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं।

कुमार राकेश
नई दिल्ली, 30 अगस्त, 2025: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में अपने एक संबोधन में ‘हिंदू राष्ट्र’ और ‘अखंड भारत’ को लेकर कई महत्वपूर्ण बयान दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह पहले से ही एक सत्य है। उन्होंने कहा कि ऋषियों और मुनियों ने इसे पहले ही राष्ट्र घोषित कर दिया है और यह किसी भी औपचारिक घोषणा का मोहताज नहीं है। भागवत के इन बयानों को संघ की 100वीं वर्षगांठ के कार्यक्रमों के बीच काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि “हिंदू राष्ट्र का मतलब किसी को बाहर करना नहीं है। हम किसी के विरोध में नहीं हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “अगर हम हिंदू राष्ट्र कहते हैं तो हम किसी को छोड़ रहे हैं, यह ठीक नहीं है।” उन्होंने कहा कि देश में रहने वाले सभी लोग, चाहे वे मुसलमान हों या ईसाई, वे सभी भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि “हम मुसलमान हो सकते हैं, ईसाई हो सकते हैं, लेकिन हम यूरोपीय या अरब नहीं हैं, हम भारतीय हैं।” यह बात उन्होंने भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को रेखांकित करते हुए कही।

‘अखंड भारत’ एक सांस्कृतिक चेतना

मोहन भागवत ने ‘अखंड भारत’ की अवधारणा पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अखंड भारत सिर्फ एक राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत सत्य है। उन्होंने कहा कि जब भारत अखंड था, तब भी यहां कई राजा और राज्य थे, लेकिन उस भूमि की जनता, उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम, कहीं भी स्वतंत्र रूप से आ-जा सकती थी और अपनी आजीविका कमा सकती थी। उनका मानना है कि यह आपसी जुड़ाव और साझा संस्कृति ही भारत की असली ताकत है।

भागवत ने कहा कि भारत से जो देश अलग हुए, वे अपनी गलती का अहसास कर रहे हैं और फिर से भारत के साथ आना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि “जब यह स्वभाव वापस आ जाएगा तो सारा भारत एक हो जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत का डीएनए पिछले 40,000 सालों से एक ही है। यह बयान भारतीय उपमहाद्वीप के सभी लोगों की साझा विरासत पर जोर देता है।

‘हिंदू’ शब्द का अर्थ और सभी धर्मों का सम्मान

आरएसएस प्रमुख ने ‘हिंदू’ शब्द का भी एक व्यापक अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि हिंदू का मतलब है अपनी श्रद्धा के साथ दूसरों के धर्म का भी सम्मान करना। जो लोग इस परंपरा का पालन करते हैं, वे हिंदू हैं। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान करना और मिलजुल कर रहना ही सच्चा हिंदू धर्म है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इसमें किसी भी तरह का प्रलोभन या बल प्रयोग नहीं होना चाहिए।

भागवत ने समाज में एकता और आपसी विश्वास बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी को मिलकर काम करना चाहिए और समाज को बदलने की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी एक संगठन की नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति की है। उनके ये बयान भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दे रहे हैं, जिसमें राष्ट्रीय पहचान, धर्म और संस्कृति के बीच के संबंधों पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है।

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