आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों पर मोहन भागवत का बड़ा बयान: “मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं”

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  • संघ और बीजेपी में कोई झगड़ा नहीं: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि संगठन और पार्टी के बीच ‘मतभेद’ हो सकते हैं, ‘मनभेद’ नहीं।
  • क्षेत्र विशेषज्ञता का सिद्धांत: उन्होंने कहा कि संघ शाखाएं चलाने में माहिर है, जबकि बीजेपी सरकार चलाने में, इसलिए दोनों को एक-दूसरे की विशेषज्ञता का सम्मान करना चाहिए।
  • सलाह दे सकता है संघ, फैसला बीजेपी का: भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ केवल सुझाव देता है, लेकिन अंतिम निर्णय बीजेपी का ही होता है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 28 अगस्त, 2025: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गुरुवार को संघ और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच संबंधों को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया। दिल्ली में संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के दौरान एक संवाददाता सम्मेलन में भागवत ने साफ किया कि दोनों संगठनों के बीच कोई ‘झगड़ा’ नहीं है, लेकिन उनके बीच ‘मतभेद’ या ‘संघर्ष’ हो सकता है। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ समय से बीजेपी के कुछ फैसलों को लेकर संघ और पार्टी के बीच अनबन की खबरें सामने आ रही थीं।

संघ और सरकार की अलग-अलग विशेषज्ञता

एक सवाल के जवाब में डॉ. भागवत ने दोनों संगठनों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत पेश किया। उन्होंने कहा, “मैं 50 साल से शाखा चला रहा हूं, इसलिए अगर कोई मुझे शाखा चलाने के बारे में सलाह देता है तो मैं उस क्षेत्र का विशेषज्ञ हूं। वे (बीजेपी) कई सालों से सरकार चला रहे हैं, इसलिए वे सरकार चलाने के विशेषज्ञ हैं। हमें एक-दूसरे की विशेषज्ञता का सम्मान करना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि संघ किसी भी अच्छे काम के लिए किसी भी संगठन को सहायता दे सकता है। उन्होंने मजाकिया लहजे में यह भी कहा कि अगर संघ बीजेपी के लिए सभी फैसले लेता तो बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति में इतना समय नहीं लगता।

सिर्फ सलाह देने की भूमिका

मोहन भागवत ने दोहराया कि संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है और वह बीजेपी को केवल सुझाव दे सकता है, अंतिम निर्णय लेने का अधिकार बीजेपी का है। उन्होंने कहा कि “हमारे यहां मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं हो सकता।” उन्होंने यह भी बताया कि संघ का केंद्र और राज्य, दोनों की सरकारों के साथ अच्छा समन्वय है। यह बयान इस बात पर जोर देता है कि संघ पर्दे के पीछे से सरकार को नियंत्रित नहीं करता, जैसा कि अक्सर विपक्षी दल आरोप लगाते हैं। भागवत ने कहा कि कुछ ऐसी व्यवस्थाएं हैं जो ब्रिटिश काल से चली आ रही हैं और उनमें कुछ आंतरिक विरोधाभास हैं, जिन्हें सुधारने के लिए नवाचार की आवश्यकता है।

राजनीतिक गलियारों में बयान के मायने

डॉ. भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ मुद्दों पर बीजेपी सरकार की नीतियों और संघ की विचारधारा के बीच टकराव की खबरें आ रही थीं। विशेषकर, कुछ आर्थिक नीतियों और पार्टी के आंतरिक संगठनात्मक मामलों को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही थी। भागवत के बयान को इन अटकलों को शांत करने और संघ के स्वयंसेवकों को एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यह संदेश है कि संघ का मूल काम समाज निर्माण और वैचारिक मार्गदर्शन है, जबकि सरकार चलाना बीजेपी का काम है। यह दोनों संगठनों के बीच एक स्वस्थ और सहयोगी संबंध की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जिसमें एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र का सम्मान किया जाए।

 

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