पूनम शर्मा
केरल, जिसे कभी धार्मिक सद्भाव और शिक्षा का गढ़ कहा जाता था, आज एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जिसे राजनीतिक वर्ग “भ्रम” कहकर नकारने में लगा है। यह संकट है – “लव जिहाद”। यह कोई व्यक्तिगत प्रेम प्रसंग की त्रासदी नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से रची गई साजिश है, जहाँ कमजोर युवतियों को पहले प्रेम और आकर्षण के जाल में फँसाया जाता है, फिर धीरे-धीरे उन्हें परिवार और समाज से अलग करके दबावपूर्ण धर्मांतरण और कभी-कभी कट्टरपंथी नेटवर्क तक खींच लिया जाता है।
सोना एलधोज़ की मौत – मौन को तोड़ने वाली चीख
9 अगस्त 2025 को पुथुप्पडी, कोठमंगलम की 23 वर्षीय टीटीसी छात्रा सोना एलधोज़ ने आत्महत्या कर ली। पिता की हाल ही में मृत्यु हो चुकी थी और निजी आघात के बीच उसे सहारे की जगह मिला छल और दबाव। उसकी सुसाइड नोट में सीधे-सीधे प्रेमी रमीज़ का नाम था – वही रमीज़ जिसके खिलाफ पहले से सात मादक पदार्थों के मामले लंबित हैं।
रमीज़ पर आरोप है कि उसने सोना को लगातार इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया और विवाह की शर्त भी यही रखी। व्हाट्सऐप चैट में साफ दिखता है कि वह उसे आत्महत्या की ओर प्रेरित कर रहा था। पुलिस जांच से यह तथ्य भी सामने आया कि रमीज़ उसे पोनानी भेजने की योजना बना रहा था – वही पोनानी जिसे पुलिस इंटेलिजेंस जबरन धर्मांतरण “कक्षाओं” का केंद्र बताता रहा है।
यह कोई व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि एक पैटर्न है। रमीज़ की मां स्वयं विवाह के बाद ईसाई से मुस्लिम बनी थीं। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला क्रम राज्य की सामाजिक संरचना पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
केरल का कट्टरपंथ से पुराना रिश्ता
2010 के दशक में केरल से कई युवतियों के आईएसआईएस में शामिल होने की खबरें आईं। सोनीया सेबेस्टियन (आयशा), मेरिन जैकब (मरियम) और निमिषा (फातिमा ईसा) – तीनों पढ़ी-लिखी, मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां थीं। इनका सफर मासूम प्रेम प्रसंग से शुरू हुआ और अंततः इन्हें कट्टरपंथी नेटवर्क ने सीरिया और अफगानिस्तान तक पहुँचा दिया।
आज ये महिलाएँ विदेशी जेलों और डिटेंशन कैंपों में पड़ी हैं। इनके पति लड़ाई में मारे गए और ये अपनों से दूर पराई सरजमीं पर भटक रही हैं। यह उदाहरण बताता है कि प्रेम और विश्वास का दुरुपयोग कर कैसे युवतियों को जिहादी नेटवर्क की मोहरा बनाया जाता है।
राजनीतिक चुप्पी और वोट-बैंक की राजनीति
केरल की दोनों प्रमुख राजनीतिक धाराएँ – एलडीएफ और यूडीएफ – इस समस्या को लगातार नकारती रही हैं। जब उत्तर प्रदेश और अन्य भाजपा शासित राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाकर सख्ती दिखाई, तब केरल सरकार केवल “सेक्युलरिज्म” के नाम पर चुप्पी साधे रही।
सवाल है – क्यों?
इसका उत्तर है वोट-बैंक की राजनीति। केरल में मुस्लिम आबादी 27% से अधिक हो चुकी है। इस जनसंख्या का राजनीतिक प्रभाव इतना है कि किसी भी सत्तारूढ़ दल को उनके वोटों की अनदेखी करने का साहस नहीं होता। नतीजा यह है कि गैर-मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा, परिवारों का दर्द और समाज की चिंता सब “चुनावी गणित” की भेंट चढ़ जाते हैं।
चर्च और आरएसएस की चिंताएँ
सिरो-मलाबार चर्च ने कई बार खुलकर कहा है कि “लव जिहाद” ईसाई युवतियों के लिए गंभीर खतरा है। आरएसएस और भाजपा तो लंबे समय से चेतावनी देते आए हैं कि यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं बल्कि संगठित अभियान है। भाजपा नेता पी.के. कृष्णदास और शोन जॉर्ज ने हाल ही में कहा कि यह “पवित्र कार्य” बताकर गैर-मुस्लिम युवतियों को फँसाने की जिहादी मानसिकता का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और वास्तविकता
हादिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने “व्यक्ति की पसंद” को मान्यता दी। लेकिन सवाल उठता है – अगर पसंद दबाव, धोखे और मानसिक प्रलोभन के तहत हो तो क्या यह सचमुच स्वतंत्र पसंद है? केरल में कई मामलों में युवतियाँ स्पष्ट रूप से दबाव और मानसिक उत्पीड़न का शिकार रही हैं। ऐसे में महज़ “चॉइस” का हवाला देकर सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
समाज के लिए चेतावनी
सोना एलधोज़ की मौत केवल एक घटना नहीं बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। यह वह क्षण है जब हिंदू और ईसाई समुदायों को एकजुट होकर इस समस्या को स्वीकारना और उसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए।
परिवारों को सतर्क रहना होगा।
युवतियों को सोशल मीडिया पर फैल रहे जाल से बचाने के लिए शिक्षा और जागरूकता ज़रूरी है।
राज्य को धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने में देर नहीं करनी चाहिए।
कट्टरपंथी नेटवर्क की जाँच और निगरानी के लिए एनआईए जैसी एजेंसियों को शामिल करना होगा।
निष्कर्ष
केरल की मौजूदा स्थिति केवल “व्यक्तिगत त्रासदियों” का जोड़ नहीं है। यह एक सुनियोजित सामाजिक संकट है, जिसे अनदेखा करना आने वाली पीढ़ियों के लिए और भयावह परिणाम देगा। जब तक सरकारें वोट-बैंक की राजनीति छोड़कर कठोर निर्णय नहीं लेंगी, तब तक सोना जैसी न जाने कितनी बेटियाँ “मौन” की शिकार बनती रहेंगी।
अब समय आ गया है कि केरल का समाज अपनी आंखें खोले और सत्ता से जवाब माँगे – कब तक गैर-मुस्लिम बेटियों की बलि वोट-बैंक के लिए चढ़ाई जाएगी?