पूनम शर्मा
यूनेस्को यानी ‘संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन’ (UNESCO) को वैश्विक धरोहरों की सुरक्षा करने के लिए एक निष्पक्ष संस्थान माना जाता था। लेकिन अब यह संस्था एक सांस्कृतिक शक्ति का हथियार बन रही है, जहाँ यूरोपीय देशों और चीन का अधिकांश प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। क्या यह संगठन सचमुच विरासतों की सुरक्षा करता है अथवा सांस्कृतिक नियंत्रण का हथियार बन चुका है एक ‘वोक-संस्कृति’ के नाम पर? वर्तमान वर्षों में यह संस्था एक “विरासत प्रमाणन एजेंसी” नहीं रहने के बावजूद, एक छिपे हुए सांस्कृतिक और राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए ही जैसे बन गई है। भारत जैसी सांस्कृतिक महाशक्ति राष्ट्र के लिए यह चिंतन का विषय है—क्या हमें अब भी इस संस्था से उम्मीदें रखनी चाहिए, जब अमेरिका जैसी महाशक्ति ने इसे दो बार छोड़ दिया है?
पहला बहिष्कार (1984):
1984 में अमेरिका ने यूनेस्को पर “भारी राजनीतिकरण”, “पश्चिम-विरोधी एजेंडा”, और “अकार्यक्षमता” का आरोप लगाते हुए संगठन से नाता तोड़ लिया था। अमेरिका का आरोप था कि यूनेस्को विकासशील देशों में समाजवाद और साम्यवादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है।
दूसरा बहिष्कार (2017):
2017 में अमेरिका ने एक बार फिर यूनेस्को छोड़ दिया। इस बार कारण था:
यूनेस्को की इजराइल-विरोधी नीतियाँ
पारदर्शिता की कमी
अनुचित सदस्यता (जैसे फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्य बनाना)
और यूनेस्को का राजनीतिकरण, खासकर इस्लामी देशों और चीन के प्रभाव में।
इसके साथ ही, अमेरिका ने कहा कि यूनेस्को “अब शिक्षा और संस्कृति का मंच नहीं रहा”, बल्कि यह एक “राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा” बन चुका है।
अमेरिका और यूरोप का वर्चस्व: क्या यह निष्पक्ष प्रतिनिधित्व है?
अमेरिका में कुल 42 साइट्स हैं, जबकि पूरे उत्तर अमेरिका में 146 से अधिक।
यूरोप में 500 से अधिक यूनेस्को धरोहर स्थल हैं—वहीं पर एशिया, जहाँ मानव सभ्यता की शुरुआत मानी जाती है, वहां केवल 273 साइट्स हैं।
देश जैसे भारत, जिनकी ऐतिहासिक और धार्मिक गंभारत हजारों साल पुरानी है, उनके पास भी केवल 42 वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स हैं।
यह असमानता यह संकेत देती है कि यूनेस्को का उद्देश्य सिर्फ विरासतों का संरक्षण नहीं, बल्कि पश्चिमी सत्ता और संस्कृति का महिमामंडन भी हो सकता है।
भारत की स्थिति: समर्पण या आत्मनिर्भरता?
भारत ने यूनेस्को की सदस्यता बरकरार रखी और 42 साइट्स को विश्व धरोहर का दर्जा दिलवाया है। परंतु इनका प्रभाव कितना सार्थक रहा है?
स्थानीय संस्कृति का दमन:
यूनेस्को साइट घोषित होने के बाद भारत के धार्मिक स्थलों पर पूजा-अर्चना या परंपरागत अनुष्ठान बंद कर दिए जाते हैं।
उदाहरण: खजुराहो, महाबलीपुरम, अजंता-एलोरा, फतेहपुर सीकरी आदि।
भारतीय दृष्टिकोण की अनदेखी:
यूनेस्को द्वारा धरोहर की परिभाषा आमतौर पर यूरोपीय औपनिवेशिक दृष्टिकोण से तय की जाती है, जहाँ सनातन संस्कृति, आस्था और श्रद्धा का महत्व नहीं दिया जाता।
भारत की ऐतिहासिक उपेक्षा:
वहाँ यूरोप में 500+ साइट्स को मान्यता दी गई है, भारत जैसे सांस्कृतिक महाद्वीप में मात्र 42।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र, जहाँ से सभ्यता शुरू हुई, वहाँ की उपस्थिति भी सीमित कर दी गई है।
भारत की विरासतों के साथ भेदभाव
भारत की यूनेस्को साइट्स की सूची में महाबलीपुरम जैसे प्रमुख मंदिर—खजुराहो, काजीरंगा, कैलाश मंदिर, चित्तौड़गढ़ किला, फतेहपुर सीकरी, आदि शामिल हैं। परंतु इन स्थलों पर भारत सरकार और एएसआई पूजा-पाठ जैसे पारंपरिक अनुष्ठानों को ‘यूनेस्को प्रोटोकॉल’ के नाम पर बंद कर देती है।
कई स्थानों पर स्थानीय धार्मिक प्रथाओं पर रोक है क्योंकि यूनेस्को की नीति “धरोहर को जैसा है वैसा बनाए रखने” की वकालत करती है, लेकिन इससे स्थानीय सांस्कृतिक जीवन थम जाता है।
उदाहरण के तौर पर, ताजमहल में स्थापित देवी-देवताओं की पूजा या स्थल की ऐतिहासिक पुनर्रचना पर रोक है।
चीन का एजेंडा और सांस्कृतिक युद्ध
चीन ने अपने कई यूनेस्को साइट्स को ‘गौरव का प्रतीक’ बनाकर पेश किया है, जैसे:
समर पैलेस, फॉरबिडन सिटी, टेराकोटा आर्मी, माउंट हुआशान
इन सभी स्थलों को इस तरह प्रस्तुत किया गया है मानो वे “चीन की सांस्कृतिक महानता” के अविनाशी स्तंभ हों।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इन साइट्स के लिए दुनिया को यह दिखाने का प्रयास करती है कि उनका इतिहास और शासन प्रणाली ‘असाधारण और श्रेष्ठ’ है। लेकिन, इसमें मुस्लिम, तिब्बती या बौद्ध विरासत को अनदेखा किया जाता है या दबा दिया जाता है।
भारत की विरासतों पर पश्चिमी मोहर: उपनिवेशवाद का नया रूप?
यूनेस्को के कई प्रावधान भारत के सांस्कृतिक स्वराज के विरुद्ध हैं:
भारत यदि किसी स्थल को वर्ल्ड हेरिटेज डिक्लेयर करवा देता है, तो वह स्थल पूरी तरह यूनेस्को प्रोटोकॉल्स के अधीन हो जाता है।
स्थानीय धार्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय या ऐतिहासिक संदर्भों में परिवर्तन की कोई अनुमति नहीं होती।
भारत में कई यूनेस्को साइट्स पर भारतीय पौराणिक इतिहास का उल्लेख तक नहीं किया गया, बल्कि विदेशी व्याख्याएं थोप दी गई हैं।
क्यों यूनेस्को अब प्रासंगिक नहीं रहा?
अब यह संस्था मूल लक्ष्यों से भटक कर राजनीतिक दबाव और लॉबिंग की शिकार हो चुकी है।
चीन और इस्लामिक देशों का इसमें वर्चस्व बढ़ा है, जबकि भारतीय दृष्टिकोण या हिंदू सभ्यता की कोई स्वतंत्र आवाज नहीं।
यदि अमेरिका को यह संगठन “वेस्ट-विरोधी और पक्षपाती” लग रहा है, तो क्या भारत के लिए यह “हिंदू-विरोधी और सांस्कृतिक उपेक्षा” का प्रतीक नहीं बन चुका?
भारत को अपनी संस्कृति के लिए खड़ा होना ही होगा।
यूनेस्को जैसी संस्थाएँ तब तक कारगर होती हैं जब वे निष्पक्ष, वैज्ञानिक और विविधतावादी रहें। परंतु जब वे चुनी हुई संस्कृतियों को उभारें और बाकियों को दबाएं, तब वे उपनिवेशवाद के नए औजार बन जाती हैं।
भारत को अब एक स्पष्ट रुख अपनाना होगा:
अगर अमेरिका यूनेस्को छोड़ सकता है, तो भारत कम से कम ‘चुप’ क्यों है?
भारत को चाहिए:
अपनी विरासतों को यूनेस्को की मोहर के बिना भी महत्त्व देना
भारत के मंदिर, स्मारक, तीर्थ, किले, ग्रंथस्थल—इनकी महत्ता हिंदू दृष्टिकोण और सनातन सिद्धांतों से तय होनी चाहिए, न कि पेरिस या जिनेवा के दफ्तरों से।
समापन वाक्य:
धरोहर सिर्फ पत्थर नहीं होते, वे उस सभ्यता की आत्मा होते हैं। और किसी भी आत्मा को पहचानने के लिए मोहर की नहीं, संवेदना और स्वाभिमान की आवश्यकता होती है।