समग्र समाचार सेवा
मालदीव,23 जुलाई : मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और वरिष्ठ नेता मोहम्मद नशीद ने भारत की भूमिका की खुलकर सराहना करते हुए कहा है कि अगर भारत का समय पर सहयोग नहीं मिला होता, तो मालदीव आर्थिक रूप से दिवालिया हो जाता। नशीद के इस बयान को भारत की “पड़ोसी प्रथम” नीति की बड़ी कूटनीतिक और मानवीय जीत के रूप में देखा जा रहा है।
भारत का समय पर दिया गया आर्थिक संबल
मोहम्मद नशीद, जो कि मालदीव की संसद (पीपल्स मजलिस) के पूर्व स्पीकर भी रह चुके हैं, ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा, “हम एक गंभीर आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहे थे, और डिफॉल्ट की आशंका वास्तविक थी। ऐसे समय में भारत का समर्थन बिना किसी शर्त और विलंब के मिला। यह हमारे लिए जीवन रक्षक साबित हुआ।”
भारत ने मालदीव को संकट के समय केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दी, बल्कि स्वास्थ्य, ईंधन, खाद्य आपूर्ति और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी सहायता दी, जिससे मालदीव की आर्थिक स्थिरता बहाल हो सकी।
भारत द्वारा प्रदान की गई सहायता के प्रमुख आयाम
भारत ने मालदीव को कई माध्यमों से सहायता दी — मुद्रा अदला-बदली समझौते (Currency Swap), रियायती ऋण, सीधी बजट सहायता, अनुदान और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के माध्यम से।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने मालदीव को 250 मिलियन डॉलर की बजट सहायता दी। इसके अतिरिक्त, टीके, मेडिकल उपकरण और जरूरी दवाइयों की आपूर्ति की गई। भारत ने ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट जैसे कई बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश किया, जिससे रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों को बल मिला।
हाल ही में भारत ने खाद्य और ईंधन जैसे आवश्यक आयात के लिए विशेष क्रेडिट लाइन भी उपलब्ध करवाई, जिससे मालदीव अपने विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित रखते हुए अंतरराष्ट्रीय ऋण चुकाने में सक्षम हो पाया।
चीन की कर्जनीति बनाम भारत की साझेदारी
नशीद के बयान को चीन की “ऋण-जाल नीति” के खिलाफ एक परोक्ष संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। चीन ने पिछले दशक में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत मालदीव को बड़े ऋणों में जकड़ दिया था। पूर्व राष्ट्रपति यामीन के शासनकाल में मालदीव पर अरबों डॉलर का चीनी कर्ज चढ़ गया, जिससे देश की संप्रभुता पर खतरा मंडराने लगा।
नशीद ने पहले भी चेताया था कि चीन के ऋण “पारदर्शिता से रहित” और “शोषणकारी शर्तों वाले” हैं, जिससे देश दीर्घकालिक आर्थिक गुलामी में फंस सकता है। इसके विपरीत, नशीद ने भारत की सहायता को “संप्रभुता का सम्मान करने वाला और पारदर्शी” बताया।
उन्होंने कहा, “भारत की सहायता कभी भी हमारी संप्रभुता पर सवाल नहीं उठाती। न उसमें सैन्य शर्तें होती हैं, न ही कोई छिपे हुए एजेंडे। यह सच्चे मित्र की तरह सहयोग करता है।”
रणनीतिक दृष्टि से भी भारत की भूमिका अहम
भारत का सहयोग केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। हिंद महासागर में मालदीव की स्थिति सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है। ऐसे में भारत का मजबूत और भरोसेमंद सहयोग चीन जैसी शक्तियों के विस्तारवादी मंसूबों को संतुलित करता है।
मालदीव में भारत की सॉफ्ट पावर — जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और पर्यटन — ने लोगों के बीच गहरी आत्मीयता पैदा की है। भारत ने न केवल सरकारों के साथ, बल्कि आम जनता के साथ भी संबंधों को मजबूत किया है।
आगे की राह और क्षेत्रीय सहयोग
मालदीव अब अपने आर्थिक पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा है। पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को विविध बनाना, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश करना और जलवायु परिवर्तन से जूझना इसकी प्राथमिकताएं हैं। इन सभी क्षेत्रों में भारत एक स्थायी और भरोसेमंद भागीदार बनकर उभरा है।
नशीद ने अपील की कि मालदीव की आने वाली सरकारें भी भारत के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखें। “भारत ने हमेशा हमारे लोगों की भलाई और स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा है,” उन्होंने कहा।
घरेलू राजनीति और भारत-मालदीव संबंध
हाल के वर्षों में मालदीव की राजनीति में ‘इंडिया आउट’ जैसे नारों ने तात्कालिक विवाद पैदा किए हैं। कुछ राजनीतिक दलों ने भारत के सैन्य सहयोग पर सवाल उठाए, लेकिन नशीद जैसे वरिष्ठ नेताओं की स्पष्ट राय यह संकेत देती है कि भारत के बिना मालदीव की आर्थिक और रणनीतिक स्थिरता संभव नहीं है।
नशीद के इस बयान से भारत के प्रति विश्वास का माहौल फिर से मजबूत हो सकता है और द्विपक्षीय सहयोग को नया आधार मिल सकता है।
एक भरोसेमंद मित्र के रूप में भारत
मालदीव की कहानी यह दिखाती है कि कैसे एक छोटा द्वीपीय देश संकट के समय में अपने क्षेत्रीय मित्र पर भरोसा कर सकता है। भारत ने न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि मानवीय और रणनीतिक स्तर पर भी मालदीव को सहारा दिया।
जब वैश्विक महाशक्तियाँ छोटे देशों को अपने हितों के लिए कर्ज में जकड़ने का खेल खेल रही हैं, तब भारत का सहयोगात्मक और सम्मानजनक दृष्टिकोण एक आदर्श बनता जा रहा है। नशीद की सार्वजनिक सराहना केवल कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह भारत की भूमिका के प्रति एक ईमानदार स्वीकृति है — एक ऐसा देश जिसने हमेशा पड़ोसी को सहयोग और सम्मान दिया है, शर्तों और लालचों के बिना।