हिंदुत्व, मराठी मानूस और बीएमसी का संग्राम

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पूनम शर्मा
मुंबई की राजनीति में “मराठी मानूस” एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा रहा है, जिसने दशकों से इस महानगर के सत्ता समीकरणों को प्रभावित किया है। महाराष्ट्र की राजधानी होने के बावजूद, मुंबई की जनसंख्या संरचना में भारी बदलाव और बाहरी राज्यों से आए प्रवासियों की बाढ़ ने यहाँ  के मूल निवासियों—मराठी भाषी लोगों—को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया। इसी भावनात्मक असंतुलन ने 1960 के दशक में शिवसेना जैसे क्षेत्रीय दल के उदय की भूमिका तैयार की।

शिवसेना का उदय और मराठी अस्मिता

बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना ने मराठी युवाओं को ‘भूमिपुत्र’ के नाम पर संगठित किया। उनका नारा था — “मुंबई मराठ्यांचीच” (मुंबई मराठियों की ही है)। हालांकि, समय के साथ शिवसेना ने अपने क्षेत्रीय एजेंडे से हटकर व्यापक हिंदुत्व की राजनीति की ओर रुख किया और 1984 में बीजेपी के साथ गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़े। यह गठबंधन शिवसेना को महाराष्ट्र के बाहर भी पहचान दिलाने में सफल रहा।

वंशवाद, बगावत और नई पार्टी

बालासाहेब की मृत्यु (2012) के बाद उनके बेटे उद्धव ठाकरे पार्टी के नेता बने, जिससे पार्टी में आंतरिक असंतोष पनपने लगा। नाराज होकर बालासाहेब के भतीजे राज ठाकरे ने 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) बनाई, जो पूरी तरह से मराठी अस्मिता के मुद्दे पर केंद्रित थी। राज के नेतृत्व में एमएनएस ने 2009 के विधानसभा चुनावों में 13 सीटें जीतकर शिवसेना के वोट बैंक में सेंध लगा दी।

2019 के बाद का राजनीतिक यू-टर्न

2019 विधानसभा चुनावों में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन मुख्यमंत्री पद की लालसा में उद्धव ठाकरे ने गठबंधन तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। यह निर्णय जनता के जनादेश का अपमान माना गया और शिवसेना की वैचारिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग गया।

सरकार बनने के बाद उद्धव ने ‘समावेशी हिंदुत्व’ की बात करनी शुरू की और मुस्लिम समुदाय को साधने के प्रयास किए। यह शिवसेना के पारंपरिक समर्थकों को रास नहीं आया और पार्टी के भीतर असंतोष गहराता गया।

शिंदे बगावत और पार्टी का विभाजन

2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में विद्रोह हुआ, जिसके बाद शिंदे गुट ने पार्टी का नाम, चिन्ह और सरकार दोनों अपने कब्जे में ले लिए। उद्धव ठाकरे को अपनी अलग पार्टी “शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)” बनानी पड़ी, जो अब कांग्रेस और अन्य दलों के साथ ‘INDI गठबंधन’ में शामिल है।

चचेरे भाइयों की कथित एकता

हाल ही में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक साथ मंच पर देखे गए जब महाराष्ट्र सरकार ने स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव वापस लिया। इस अवसर पर दोनों नेताओं ने ‘मराठी एकता की जीत’ का जश्न मनाया और कहा कि वे साथ आए हैं और साथ रहेंगे। यह बयान आगामी बीएमसी चुनावों को ध्यान में रखकर दिया गया माना जा रहा है।

बीएमसी चुनाव: असली अखाड़ा

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) देश की सबसे अमीर नगरपालिका है, जिसका बजट ₹74,000 करोड़ से अधिक है। जाहिर है, इस सत्ता और संसाधनों के केंद्र पर कब्जा करने की कोशिश सभी पार्टियां करेंगी। मराठी मानूस का मुद्दा फिर से उछाला जाएगा, वर्षों पुरानी भावनाओं को फिर से कुरेदा जाएगा।

लेकिन हकीकत यह है कि मराठी भाषी आबादी मुंबई में लगातार घट रही है। मूल मुम्बईकरों का विस्थापन एक कड़वा सच बनता जा रहा है। उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार की बात करने वाली पार्टियों ने अक्सर इस मुद्दे को केवल चुनावी वक्त पर भुनाया है।

मराठी मानूस का मुद्दा आज भी मुंबई की राजनीति की धुरी है, लेकिन क्या यह वाकई किसी पार्टी की प्राथमिकता है या सिर्फ वोट बटोरने का माध्यम? क्या यह मुद्दा बार-बार सिर्फ चुनावों के दौरान ही जिंदा होता रहेगा? बीएमसी चुनावों में इसका जवाब मिलेगा, जब मतदाता तय करेंगे कि वे भावनाओं की राजनीति को चुनते हैं या जमीनी हकीकतों के आधार पर वोट देते हैं।

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