पूनम शर्मा
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की कार्रवाई को लेकर विपक्ष की याचिका पर सुनवाई की तैयारी है, और इसी बीच एक बड़ा राजनीतिक संग्राम छिड़ गया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल चुनाव आयोग पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वह केंद्र सरकार के इशारों पर काम कर रहा है। बिहार से लेकर दिल्ली तक विपक्षी नेता लगातार यह कहते आ रहे हैं कि आयोग जानबूझकर उनके वोटर्स के नाम मतदाता सूची से हटा रहा है।
लेकिन क्या यह सिर्फ डर है या कोई बड़ी सच्चाई?
एक बात तो साफ़ है—विपक्ष को अब यह महसूस होने लगा है कि उनका पारंपरिक वोट बैंक, खासतौर पर अवैध प्रवासियों और फर्जी दस्तावेजों के सहारे बने मतदाताओं का वर्ग, चुनाव आयोग के रडार पर आ गया है। इसीलिए हड़बड़ी में सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई, ताकि आयोग की इस “कड़ी कार्रवाई” को रोका जा सके।
वोटर कार्ड से लेकर फर्जी आधार तक—बंगाल, बिहार और दिल्ली का कनेक्शन
जानकारों का कहना है कि जिन लोगों की पहचान पर सवाल उठ रहे हैं, उनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं जो बांग्लादेश से अवैध तरीके से भारत आए हैं। उनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, और यहाँ तक कि वोटर आईडी भी मौजूद है। दिल्ली में पकड़े गए कई लोगों के पास फर्जी दस्तावेज थे और मोबाइल फोन में बांग्लादेशी नेटवर्क के प्रमाण तक मिले हैं। हवाला ट्रांजैक्शन भी उनके खातों में सामने आए हैं।
क्या यही कारण है कि विपक्ष को अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता से परेशानी हो रही है?
कानून की लड़ाई या सड़कों की राजनीति?
सवाल यह है कि अगर विपक्ष को चुनाव आयोग की कार्रवाई पर कानूनी आपत्ति है, तो उसे कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए। लेकिन इसके बजाय विपक्ष सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से एक दिन पहले ही चक्का जाम और आंदोलन की धमकी दे रहा है।
यह वही पुरानी रणनीति है—पहले सड़क पर हंगामा करो, फिर कोर्ट में जाकर यह दलील दो कि स्थिति बिगड़ रही है, इसलिए अंतरिम रोक लगाओ। यही पैटर्न हमने पहले भी देखा है—राम मंदिर, तीन तलाक, और UCC जैसे मुद्दों पर भी।
महाराष्ट्र में भी उठापटक—राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की जुगलबंदी से कांग्रेस असहज
एक और बड़ा सियासी घटनाक्रम महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की संभावित जुगलबंदी से राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। यह गठबंधन कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बन गया है, क्योंकि कांग्रेस इस मंच से दूरी बनाकर चल रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि दिल्ली से उन्हें कोई स्पष्ट आदेश नहीं मिला था, लेकिन अंदरखाने की चर्चाएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की मनसे अगर साथ आते हैं, तो यह एक मजबूत मराठी मंच बन सकता है। लेकिन कांग्रेस के भीतर विरोध की आवाजें उठ रही हैं कि जब उद्धव ठाकरे ही मुख्यमंत्री बने थे, तब कांग्रेस के 26 विधायक सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर नाराज़गी जता चुके थे।
शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस—तीनों दिशाओं में बंटे
एनसीपी के शरद पवार खेमे की भी स्थिति भ्रमित करने वाली है। कोई एक धारा बीजेपी के साथ है, तो दूसरी कांग्रेस के साथ। महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तरह का मतभेद और अंतर्विरोध है, उससे साफ़ है कि असली मुकाबला अब महाविकास अघाड़ी और महायुती से आगे निकलकर तीन ध्रुवीय हो रहा है।
क्या चुनाव आयोग की सख्ती जरूरी है?
बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जिस तरह से फर्जी दस्तावेजों के ज़रिए वोटिंग होती रही है, उसे देखते हुए चुनाव आयोग की वर्तमान सख्ती को ज़रूरी कदम कहा जा सकता है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता बनने के लिए कम से कम एक वैध दस्तावेज ज़रूरी है। अगर आपके पास कुछ भी नहीं है, तो फिर आप वोट देने के हक़दार कैसे हो सकते हैं? सरकार और आयोग का उद्देश्य है—केवल वास्तविक नागरिक ही मतदान करें। लेकिन विपक्ष इसे “वोटर लिस्ट से नाम काटने की साजिश” करार दे रहा है।
सारांश: यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक चुनावी विवाद नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, उसकी पारदर्शिता, और संविधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट को 10 जुलाई को इस याचिका पर सुनवाई करनी है, लेकिन उससे पहले विपक्ष का आंदोलन यह सवाल उठाता है कि उन्हें देश की अदालतों और संस्थानों पर कितना विश्वास है।
यदि राजनीति केवल वोट बैंक की रक्षा और अवैध तत्वों को बचाने तक सिमट जाए, तो जनता को ही तय करना होगा कि उन्हें कैसा नेतृत्व चाहिए—संविधान आधारित या सिर्फ सत्ता लोलुप।