कहानी बड़ी सुहानी प्रेरक कहानियां

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कहानी- बड़ी सुहानी प्रेरक कहानियां

(1) कहानी:  बेटी की चाह

✍️40-42 साल की घरेलू स्त्री थी सुधा. भरापूरा परिवार था. धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी. सुधा भी ख़ुश ही थी अपने घर-संसार में, लेकिन कभी-कभी अचानक बेचैन हो उठती. इसका कारण वह ख़ुद भी नहीं जानती थी.

✍️पति उससे हमेशा पूछते कि उसे क्या परेशानी है? पर वह इस बात का कोई उत्तर न दे पाती.

✍️तीनों ही बच्चे बड़े हो गए थे. सबसे बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में, मंझला पहले वर्ष में और छोटा दसवीं में था. तीनों ही किशोरावस्था में थे. अब उनके रुचि के विषय अपने पिता के विचारों से ज़्यादा मेल खाते. वे ज़्यादातर समय अपने पिता, टीवी और दोस्तों के साथ बिताते. सुधा चाहती थी कि उसके तीनों बेटे उसके साथ कुछ समय बिताएं, पर उनकी रुचियां कुछ अलग थीं. अब वे तीनों ही बच्चे नहीं रह गए थे, धीरे-धीरे वे पुरुष बनते जा रहे थे.

✍️एक सुबह सुधा ने अपने पति से कहा, “मेरी ख़ुशी के लिए आप कुछ करेंगे?”

पति ने कहा, “हां-हां क्यों नहीं? तुम कहो तो सही.”

सुधा सहमते हुए बोली, “मैं एक बेटी गोद लेना चाहती हूं.”

✍️पति को आश्चर्य हुआ, पर सुधा ने कहा, “सवाल-जवाब मत करिएगा, प्लीज़.” तीनों बच्चों के सामने भी यह प्रस्ताव रखा गया, किसी ने कोई आपत्ति तो नहीं की, पर सबके मन में सवाल था “क्यों?”

✍️जल्द ही सुधा ने डेढ़ महीने की एक प्यारी-सी बच्ची अनाथाश्रम से गोद ले ली. तीन बार मातृत्व का स्वाद चखने के बाद भी आज उसमें वात्सल्य की कोई कमी नहीं थी.

✍️बच्ची के आने की ख़ुशी में सुधा और उसके पति ने एक समारोह का आयोजन किया. सब मेहमानों को संबोधित करते हुए सुधा बोली, “मैं आज अपने परिवार और पूरे समाज के ‘क्यों’ का जवाब देना चाहती हूं. मेरे ख़याल से हर घर में एक बेटी का होना बहुत ज़रूरी है. बेटी के प्रेम और अपनेपन की आर्द्रता ही घर के सभी लोगों को एक-दूसरे से बांधे रखती है.

✍️तीन बेटे होने के बावजूद मैं संतुष्ट नहीं थी. मैं स्वयं की परछाईं इनमें से किसी में नहीं ढूंढ़ पाती. “बेटी शक्ति है, सृजन का स्रोत है”. मुझे दुख ही नहीं, पीड़ा भी होती है, जब मैं देखती हूं कि किसी स्त्री ने अपने भ्रूण की हत्या बेटी होने के कारण कर दी .
✍️मैं समझती हूं कि मेरे पति का वंश ज़रूर मेरे ये तीनों बेटे बढ़ाएंगे, पर मेरे ‘मातृत्व’ का वंश तो एक बेटी ही बढ़ा सकती है…

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(2) चिंतन:  अपने पर भरोसा करें   कि आप समर्थ हैं

👉 “विश्वास” हमारी जीवन-नैया को तूफानी सागर में भी खेता है । “विश्वास” पर्वतों को डिगा देता है । विशाल सागर को लांघ सकता है । “विश्वास” कोमल पुष्प नहीं है, जो साधारण वायु के झोंके से गिर जाए । “स्वेट मार्टेन” ने लिखा है– “विश्वास” जीवन के उस मार्ग की खोज करता है जो हमें मंजिल तक पहुँचाता है ।” राजा भगीरथ को गंगावतरण में इस “आत्मविश्वास” ने सफलता पहुँचाई थी ।
👉 “आत्मविश्वास” के समक्ष “अभाव,” “अभिशाप,” “दीनता,” “दारिद्रय” निष्क्रिय हो जाते हैं । संसार में ऐसी कितनी ही विभूतियों ने जन्म लिया है, जो इन बाधाओं को ठोकर मारते हुए मंजिलों पर पहुँची हैं ।
👉 “मनुष्य” अपने व्यक्तित्व का निर्माता स्वयं है ।” उसके पास “आत्मविश्वास” का बहुत बड़ा संबल है । मनुष्य को अपने चरित्र, गुण एवं व्यक्तित्व निर्माण के लिए “आत्मविश्वास” आवश्यक है । कुछ लोगों में अच्छी शिक्षा, अच्छा साधन, अच्छा ज्ञान होता है, फिर भी उनको अपने कार्यों में सफलता इसलिए नहीं प्राप्त होती, क्योंकि उनमें “आत्मविश्वास’.की कमी है ।
👉 संसार का कर्णधार वही बन सकता है, जिसमें “आत्मविश्वास” है । नए मार्गो के शोधक भी वे ही व्यक्ति होते हैं । “अतः “आत्मविश्वास” के महत्व को हृदयंगम कर उसमें प्रगति लाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए ।”

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(3) चिन्तन:  सत्य को ही अपनाएँ, असत्य को नहीं

👉 “सत्य” ही जीतता है, “असत्य” नहीं । “सत्य” से ही देवयात्रा प्रशस्त होती है, “सत्य” से ही ऋषिगण अपनी कामनाओं को जीतते हैं । “सत्य” रूप परमात्मा को प्राप्त करते हैं ।
👉 विश्व के सभी मनीषियों ने “सत्य” की महिमा गाई है । सभी धर्म-ग्रंथ, महापुरुषों के संदेश इसी तथ्य की ओर निर्देश करते हैं कि मनुष्य “सत्य” मार्ग का अनुसरण करें ।
👉 दार्शनिक प्लेटो का वचन है — “सत्य” को ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को प्रकाश कहते हैं । महात्मा शेख़सादी की उक्ति है – “ईश्वर को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग “सत्य” को अपनाना है । जो सच्चाई के मार्ग पर चलता है, वह भटकता नहीं । मनीषी कांट का कथन है — “सचाई” वह तत्व है जिसे अपनाने पर मनुष्य भले और बुरे की परख कर सकता है । हृदयगत सभी सद्गुणों के विकास की कुंजी मनुष्य की “सत्यनिष्ठा” में सन्निहित है । विद्वान ऐनोन कहा करता था – “यह मत देखो कि कौन कह रहा है वरन यह देखो कि “सत्य” कहाँ से क़हा जा रहा है । होरेसमन का अभिमत है — “यह जरूरी नहीं कि बिना पात्र-कुपात्र का ख्याल किए हर सच्ची बात पूरी की पूरी हर किसी से कह दी जाए, परन्तु इतना ध्यान अवश्य रखा जाए कि जिससे जितना क़हा जाए वह “सत्य” ही होना चाहिए । संत सिल्वियो वैलिकौ ने कहा है — “ईश्वर से प्रेम करना और “सत्य” से प्रेम करना एक ही बात है ।

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(4) चिंतन 

हम एक दूसरे के साथ कर्मों की डोरी से बँधे हुए हैं, हम अपने कर्मों के लेन-देन का हिसाब पूरा करने के लिए ही यहां आते हैं।

संसार में कोई माँ-बाप और औलाद बनकर आ जाता है, कोई दोस्त और कोई रिश्तेदार बनकर आ जाता है। लेकिन जैसे-जैसे इस जन्म में प्रारब्ध कर्मों का का हिसाब-किताब ख़त्म हो जाता है, हम एक-दूसरे से अलग होकर अपने-अपने रास्ते पर चल देते हैं।

यह दुनिया एक सराय की तरह है, जहां सब मुसाफ़िर रात-भर के लिए इकट्ठे होते हैं और सुबह होते ही अपनी अपनी राह चल देते हैं। यों भी कह सकते हैं कि हम पंछियों की तरह हैं, जो सांझ होने पर पेड़ पर आ बैठते हैं और सूरज की पहली किरण के आते ही, अपनी-अपनी राह उड़ जाते हैं।

!!!…”आवाज” ऊँची होगी तो “कुछ” ही लोग “सुनेंगे”…किन्तु “बात” ऊँची होगी तो “दुनियाँ” सुनेगी…!!!

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(5) चिंतन

जिस तरह से हम नदी के जल को लहरों के बिना नहीं जान सकते, जिस तरह से हम दृष्टि के बिना आख को नहीं जान सकते, जिस प्रकार से ध्रुव तारे को आकाश की बिना हम नहीं समझ सकते- उसी प्रकार से हम मानवीय जीवन की उन्नति को गुरु के बिना नहीं समझ सकते हैं। ज्ञान को, ध्यान को, चेतना को, चिंतन को, संस्कार को, विचारों को, देश को, परिवेश को, विश्व को जानने,भक्ति को तथा मुक्ति को जानने के लिए जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है। स्कंद पुराण में गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि गुरु-महीमा का दाता, महिमा का संदेशवाहक, चेतना का सारथी, संस्कारों को संहवाक,प्रम का प्रतिनिधि होता है। वह कुरीतियों को हटाता है तथा संस्कार लाता है। गुरु प्रदत्त ज्ञान व्यक्ति को सर्वतोभावेन विकसित करता है।

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(6) चिंतन

जिस प्रकार कपड़े पर नया रंग चढ़ाने के लिए पहले उसकी गंदगी को धोना पड़ता है और फिर उस पर नया रंग चढ़ाना संभव हो पाता है। उसी प्रकार मानवीय व्यक्तित्व पर देवी अनुग्रह का रंग चढ़ाने से पहले व्यक्तित्व की धुलाई और रंगाई जरूरी हो जाती है। हमारे अवचेतन पर पूर्व जन्मों के किए गए कुकर्मों संस्कारों के मेल की परत चढ़ जाती है। गुरु देव अपने पूर्व जीवन पर छाई हुई मलिनता से मुक्ति भी दिलाता है।हमें श्रेष्ठ बना कर परमात्मा के चरणों में बैठने योग्य बना देता है। इसलिए जीवन में गुरु मार्गदर्शन व सानिध्य प्राप्त करने की परंपरा है‌। गुरु देव का सानिध्य प्राप्त होते ही हमारा व्यक्तित्व प्रकाशित हो उठता है। और अंतर्मन पर ईश्वरी प्रकाश का रंग चढ़ जाता है।

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