रेखा पंकज।
प्रयोगात्मक अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं, ये सौ आना टका सही बात है। इसका कड़वा अनुभव मुझे भी हो गया।
16 अप्रैल को जब में दिल्ली से लखनऊ के लिए दिल्ली एयरपोर्ट टी 2 पहुंची, तब तक सब ठीक था। रेल यात्रा करना चाहती थी पर बेटी को सुरक्षित यात्रा आकाश मार्ग ही लगी। मैंने भी हां कर दी। यही ग़लत फैसला था, संभवतः। सुरक्षा दूरी महज सामान जमा करने तक थी। मुझे अपने जहाज के लिए गेट नंबर 21 पहुंचना था। पहुंची…पर वहां का हाल देखकर जी ख़बरा गया। हमसे पहले भुवनेश्वर के यात्री वहां पहले से ही थे, हमारे बाद एक और उड़ान के यात्री उस हाल में इकट्ठा हो रहे थे। आप सोच सकते है कितना हेल्दी वातावरण होगा?
लगभग 1 घंटा वहां बैठना पड़ा क्योंकि आंधी की वजह से उड़ान को डिले कर दिया गया। माहौल अजीब सा लग रहा था और भारी भी। लेकिन कोई चारा नहीं था। किसी तरह जहाज के लिए रवानगी हुई। पूरा जहाज जैम पैक्ड था। भगवान की कृपा कहूंगी मीडिल सीट में कोई नहीं आया। किसी तरह यात्रा पूरी हुई। पढ़े-लिखे लोग भी जाहिलपना दिखाते है, ये ऐसी जगहों पर खूब दिखता है। जहाज रूका नहीं कि सब एक साथ खड़े हो गये, एक दूसरे से लगभग चिपक कर, जैसे अगर नहीं उतरे तो जहाज वापस चल देगा। केवल एक ही आदमी था जिसने इस बात पर अपनी नाराजगी जाहिर की। लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा।
अपना सामान लेकर बाहर आई तो ये पता नहीं था कि उबर-ओला का ये हाल होगा। 20 मिनट की दूरी के लिए 750-850 से नीचे बुकिंग नहीं हो रही थी। आॅटो थोड़ा कम था पर एयरपोर्ट चार्जेज, जो एक ही दिन पहले 60 से 90रू कर दिए गये थेे, हर हाल में देने ही थे। आटो इसलिए अंदर आने से कतरा रहे थे। कहा भी दे देगें आ जाओ पर न आये। आपदा को भी धंधा बना लेना, ये इंडिया जैसे देशो में ही होता है। बमुश्किल एक घंटे बाद बेटी के लगातार प्रयास के बाद ओला बुक हुई, जबकि मैं मेट्रो पकड़ने के लिए निकल ही पड़ी थी।
बुख़ार सा मुझे लगने लगा था, खांसी सी भी आने लगी थी।
किसी तरह थकी-थकी सी घर पहुंची। अगले दिन शाम तक बुख़ार बढ़ गया और 18 तारीख तक 102 पर पहुंच गया। इसी दौरान कभी साथ एक ही ग्रुप में काम की हुई वरिष्ठ पत्रकार ताविषी श्रीवास्तव की दुखःद निधन की सूचना ने मेरी सांस को बोझिल कर दिया। मुझे लगा मैं भी गई…फिर बेटी का ख़्याल आया, जो ख़ुद बुख़ार में थी। मैंने तुरंत लेट कर ब्रीदिंग एक्ससाइज किया और ईश्वर को पुकारा…अभी नहीं भगवान!…अभी नहीं! ईश्वर की कृपा से थोड़ी राहत मिली। पर बुख़ार और कंपकंपाहट शरीर तोड़ रही थी। होश मे खुद को रखते हुए मैंनें बेटी से पहले अपनी दो दोस्तों को फ़ोन किया-एक अल्पना, दूसरी इरा। अल्पना ने कोविड दवा स्टार्ट करने को कहा तुरंत। उसको कोविड हो चुका था। दवा का प्रेस्कीप्शन वो पहले ही भेजी थी, क्योंकि उसे भी डायरिया के बाद ये हुआ था और डायरिया मुझे भी 3-4 दिन से था ही। पर मुझे ये सामान्य सी बात लगी थी।
इरा मेरे घर के पास ही थी। वह अपने साथ मुझे अपने घर ले आई। उसकी तीमारदारी से मैं आज बहुत हद तक बेहतर महसूस कर रही। ईश्वर उसको स्वस्थ और प्रसन्न रखे। वह ना होती तो शायद आज मैं भी न होती। ईश्वरीय अवतार ही है मेरे लिए। इस बीच, खुद बहुत बुख़ार में होकर भी मेरी बेटी मेरे लिए दिल्ली से अपना काम कर रही थी। डाक्टर से सलाह, दवाइयां, आक्सीमीटर आदि आदि। और साथ में उसके दोस्त कुशल, शालिन, शरियत और मोहित, योशिता उसकी-मेरी हौसला अफज़ाई करने में लगे रहे। बेटी की फ्लैट मेट काव्या ने भी उसे काफी सहयोग किया। इन सब की मैं बहुत अहसानमंद हूं। और राकेश मिश्रा को कैसे भूलूं, जिसने लोकल में डाक्टर से लेकर मेरे कोरोना टेस्ट की व्यवस्था की।
फिलहाल 2-3 दिन बहुत बुरे बीते। दवाएं डोलो, निम्सी और डाक्सी के लिए जूझना प़ड़ा। आक्सीमीटर बड़ी मुश्किल से मिला, जो मिलने पर काम ही नहीं कर रहा था। फिर चेंज करवाने के लिए इंतजार करना पड़ा। बेटी, बहन और भांजी अभी भी बुख़ार में है। उनके तो टेस्ट स्मेल सब नदारद…। ऐसे में आपको केवल ईश्वर का सहारा होता है। वरना बाहर के हालात तो आपको शायद ज़िंदा न रहने दें। आप पावरफुल हो या धनवान, सुनवाई मुश्किल से ही हो रही। यहां तो दोनों में ही सामान्य स्थिति। किस-किस से कहे, किस-किस का रोना रोए वाला हाल है।
इस बीच में दोष देने वाले सरकार, उसकी व्यवस्था को कस कर दे रहे। टिवट्र पर गालियां कोसना जारी है। आक्सीजन की बढ़ती मांग ने व्यवस्था की कलई खोल के रख दी। न जाने हमने पिछले दिनों क्या तैयारी की कि अब बदतर होते हालात संभल नहीं पा रहे। चुनाव रैलियों में सरकारों की लापरवाही खूब दिखी। भयानक और संभले हालात के आंकड़ें भी अपनी-अपनी सरकारों के हिसाब से आ रहे। यूं कहें सत्ता के खिलाड़ी अपना खेल अच्छा खेल रहे। लेकिन इन सबके बावजूद हम स्वंय कितने जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभा रहे है, ये भी देखना जरूरी है। बार-बार चेताने के बावजूद हम अनपढ़ गंवारों जैसा व्यवहार करते है। हमारी लापरवाही ने हमें फिर बुरे हालात में झोंक दिया और ये कितने वीभत्स हालात हमें दिखायेगा, ये रोज के आंकड़े देखकर अहसास हो जाता है।
अभी और कुछ कहने के बजाय अपनी नेगेटिव रिर्पोट का इंतजार है और बेटी-बहन-भांजी के लिए प्रार्थना है कि वह जल्दी स्वस्थ हो। प्रार्थना करती हूं कि भगवान मेरे देश को जल्द से जल्द इस आपदा से मुक्त करें।
तथास्तु!