पूनम शर्मा
उत्तर-पूर्व भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की जैव-विविधता, आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों की जीवनरेखा है। हिमालयी पारिस्थितिकी, घने वन, स्वच्छ नदियाँ और सैकड़ों जनजातीय समुदाय इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाते हैं। परंतु हाल के वर्षों में जिस प्रकार ऊर्जा परियोजनाओं, खनन और बुनियादी ढाँचे के नाम पर इस क्षेत्र में संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, वह “विकास” के नाम पर विनाश का रास्ता खोल रहा है।
असम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में प्रस्तावित तथा निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाएँ, थर्मल पावर प्लांट, खनन और पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स स्थानीय समुदायों को विस्थापन की ओर धकेल रहे हैं। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब पूरे उत्तर-पूर्व की पीक बिजली खपत 5,000 मेगावाट से कम है, तो 70,000 मेगावाट से अधिक उत्पादन का लक्ष्य किसके लिए है? स्पष्ट है कि यह मॉडल स्थानीय ज़रूरतों के लिए नहीं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट हितों और राष्ट्रीय-वैश्विक बाज़ार की माँगों को पूरा करने के लिए गढ़ा जा रहा है।
गुवाहाटी घोषणा: लोकतांत्रिक प्रतिरोध की मजबूत नींव
गुवाहाटी में हुई जन-परिषद और “गुवाहाटी घोषणा” इस शोषणकारी विकास मॉडल के विरुद्ध एक ऐतिहासिक लोकतांत्रिक हस्तक्षेप है। यह पहल केवल विरोध नहीं है, बल्कि एक वैकल्पिक विकास दृष्टि प्रस्तुत करती है — जहाँ पर्यावरण, मानवाधिकार और समुदाय की सहमति को केंद्र में रखा गया है।
घोषणा में छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371, वन अधिकार कानून और एफपीआईसी (Free Prior Informed Consent) जैसे संवैधानिक व अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के पूर्ण क्रियान्वयन की माँग, यह दर्शाती है कि यह आंदोलन भावनात्मक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी आधार पर खड़ा है। यह संदेश स्पष्ट है कि विकास तब तक वैध नहीं हो सकता, जब तक वह स्थानीय समुदायों की सहमति, सुरक्षा और अधिकारों का सम्मान न करे।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उत्तर-पूर्व के विभिन्न हिस्सों — अरुणाचल, असम, मणिपुर, सिक्किम — की संघर्षरत आवाज़ों को एक साझा मंच पर लाती है। यह एकजुटता सरकार और कॉरपोरेट गठजोड़ के सामने एक नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाती है, जो बिखरे आंदोलनों से संभव नहीं हो पाता।
कॉरपोरेट-केन्द्रित विकास बनाम पर्यावरणीय न्याय
आज का विकास मॉडल निजी पूंजी, पीपीपी ढाँचे और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर आधारित है। इसका परिणाम यह हुआ है कि संसाधनों का नियंत्रण समुदायों से निकलकर कॉरपोरेट हाथों में जा रहा है। वन संरक्षण कानून में संशोधन, ईआईए जैसी प्रक्रियाओं में छूट और मज़दूर अधिकारों का कमजोर होना इस बात का संकेत है कि “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” को “ईज़ ऑफ़ लिविंग” से ऊपर रखा जा रहा है।
बाघजान तेल रिसाव, तिस्ता बाँध आपदा, मेघालय की खनन दुर्घटनाएँ और लोअर सुबनसिरी परियोजना से जुड़ी आशंकाएँ यह साबित करती हैं कि ऊर्जा-आधारित तीव्र विकास पर्यावरणीय आपदाओं को जन्म दे रहा है। इन आपदाओं की कीमत स्थानीय समुदाय अपने जीवन, आजीविका और संस्कृति से चुकाते हैं, जबकि लाभ कॉरपोरेट मुनाफ़े के रूप में बाहर चला जाता है।
गुवाहाटी घोषणा का महत्व इसीलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह “ग्रीन एनर्जी” के नाम पर दी जा रही झूठी उम्मीदों को चुनौती देती है। मेगा डैम और मेगा सोलर पार्क जैसे प्रोजेक्ट्स दिखने में हरित हो सकते हैं, पर स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए वे उतने ही विनाशकारी हैं।
भविष्य का रास्ता: सहभागी और स्थानीय-केंद्रित विकास
उत्तर-पूर्व भारत के लिए विकास का रास्ता “ऊपर से थोपा गया मॉडल” नहीं हो सकता। यहाँ की भौगोलिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक विविधता एक सहभागी, स्थानीय ज़रूरतों पर आधारित विकास की माँग करती है। छोटे पैमाने की ऊर्जा परियोजनाएँ, सामुदायिक स्वामित्व, पारंपरिक ज्ञान का सम्मान और सख्त पर्यावरणीय मूल्यांकन ही टिकाऊ भविष्य का रास्ता दिखा सकते हैं।
गुवाहाटी घोषणा केवल एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि चेतावनी है — कि यदि राज्य और केंद्र सरकारें अपनी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं करतीं, तो विकास का यह मॉडल उत्तर-पूर्व के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएगा। यह पहल हमें याद दिलाती है कि पर्यावरण की रक्षा कोई “विकास विरोध” नहीं, बल्कि सच्चे और न्यायपूर्ण विकास की बुनियाद है।
यह आंदोलन सिर्फ उत्तर-पूर्व का नहीं, पूरे भारत के लिए एक सीख है — कि संसाधनों पर पहला अधिकार उन लोगों का है जो सदियों से उनके संरक्षक रहे हैं।