19वीं सदी की एक तमिल विरासत:बैंकॉक का श्री मरिअम्मन मंदिर

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पूनम शर्मा
बैंकाक के व्यस्त व्यावसायिक जिले सिलोम (Silom) की गगनचुंबी इमारतों के बीच, रंगों और आस्था का एक अनूठा संगम दिखाई देता है। यह है श्री मरिअम्मन मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ‘वाट कैक’ (Wat Kaek) के नाम से जानते हैं। यहाँ दक्षिण भारतीय वास्तुकला की जीवंतता, थाईलैंड की सांस्कृतिक सौम्यता के साथ इस तरह घुली-मिली है कि यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एशिया की साझा विरासत का प्रतीक बन गया है।

तमिल प्रवासियों की अनमोल विरासत

इस मंदिर की कहानी 1870 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू होती है। उस दौर में, ब्रिटिश शासन के दौरान व्यापारिक और विकास कार्यों के लिए बड़ी संख्या में भारतीय, विशेषकर तमिल लोग सियाम (थाईलैंड का पुराना नाम) आने लगे थे। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे एक द्विभाषी बोर्ड के अनुसार, इसका निर्माण लगभग 1879 में उन भारतीयों के एक समूह द्वारा किया गया था, जिन्होंने यहाँ की भूमि खरीदी थी।

हालाँकि बोर्ड पर संस्थापक का नाम स्पष्ट नहीं है, लेकिन मंदिर के पास स्थित ‘सोई वैती’ (Soi Vaiti) नामक गली इसके वास्तविक निर्माता ‘वैती पडायची’ की याद दिलाती है, जो एक तमिल अप्रवासी थे। शुरुआत में यह एक छोटा सा ‘साला’ (मंडप) था, जिसे ‘साला श्री मरिअम्मन’ कहा जाता था।

प्रवासन की लहरें और सिलोम का ‘तमिल मोहल्ला’

भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंध सदियों पुराने हैं, लेकिन 1856 की एंग्लो-थाई (बाउरिंग) संधि के बाद व्यापार के उदारीकरण ने प्रवास की एक नई लहर पैदा की। जैसा कि शिक्षाविद ए. मणि ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन कम्युनिटीज इन साउथईस्ट एशिया’ में उल्लेख किया है, तमिल लोग सबसे पहले आने वाले समूहों में से थे। वे मवेशी व्यापार, रत्न खनन और रेलवे, सिंचाई तथा बैंकिंग जैसी विकास परियोजनाओं में काम करने के लिए यहाँ आए थे।

1870 के दशक तक, सिलोम का एक छोटा सा हिस्सा ‘अनौपचारिक तमिल पड़ोस’ बन चुका था। थाई लोग तमिलों को ‘कैक’ (अतिथि) कहकर बुलाते थे, यही कारण है कि इस मंदिर का नाम ‘वाट कैक’ पड़ गया, जो आज भी लोकप्रिय है।

सांस्कृतिक विलीनीकरण और भाषा का लोप

उस समय आने वाले तमिल प्रवासी मुख्य रूप से पुरुष थे। भारत से महिलाओं को लाना दुर्लभ था, इसलिए उन्होंने स्थानीय ‘मोन’ (Mon) समुदाय की महिलाओं से विवाह किया। इन अंतर्जातीय विवाहों के परिणामस्वरूप एक दिलचस्प बदलाव आया—तमिल भाषा धीरे-धीरे लुप्त होने लगी क्योंकि नई पीढ़ी ने थाई भाषा को अपनी मातृभाषा के रूप में अपना लिया।

लेकिन, तमिलों ने अपनी पहचान को मंदिर के रूप में जीवित रखा। द्वितीय विश्व युद्ध तक, इस मंदिर का प्रबंधन मलय और भारत से आने वाले नए प्रवासियों द्वारा किया जाता रहा। 1951 तक, यह समुदाय इतना सक्रिय था कि उन्होंने तमिल में पुस्तकें प्रकाशित कर मंदिर के लिए धन जुटाया।

जब उत्तर भारतीय और तमिल संस्कृतियाँ टकराईं

समय के साथ, उत्तर प्रदेश से आए प्रवासियों ने भी यहाँ पूजा करना शुरू किया और वे इसे ‘श्री महा उमादेवी मंदिर’ कहने लगे। 1920 के दशक के आसपास, उत्तर भारतीय ‘वैष्णव’ और तमिल ‘शैव’ परंपराओं के बीच कुछ वैचारिक मतभेद उभरे। अंततः, उत्तर भारतीय प्रवासियों ने बैंकाक में भगवान विष्णु को समर्पित अपना अलग मंदिर बना लिया, जबकि मरिअम्मन मंदिर अपनी विशिष्ट तमिल (तंजावुर) पहचान के साथ आगे बढ़ता रहा।

आस्था का आधुनिक स्वरूप: थाई और चीनी भक्तों का केंद्र

आज जब आप इस मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो एक दुर्लभ दृश्य दिखाई देता है। मंदिर के पुजारी आज भी तमिलनाडु से आते हैं, लेकिन दर्शनार्थियों में अधिकांश थाई और थाई-चीनी मूल के लोग होते हैं। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहाँ आने वाले अधिकांश भक्त अब भारतीय नहीं, बल्कि स्थानीय थाई नागरिक हैं। वे यहाँ सुखद वैवाहिक जीवन, संतान प्राप्ति या व्यापार में सफलता की मन्नत लेकर आते हैं।

बौद्ध बहुल देश होने के बावजूद, थाईलैंड में भगवान गणेश और देवी उमा की पूजा बहुत लोकप्रिय है। मंदिर की दीवारों पर भारत के तिरंगे के साथ थाईलैंड का राष्ट्रीय ध्वज और शाही झंडा लहराता है, जो दो संस्कृतियों के अटूट बंधन को दर्शाता है।

उत्सव और राजसी सम्मान

मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण ‘नवरात्रि’ या ‘दशहरा’ का उत्सव है। दस दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान के अंतिम दिन देवी की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में भारतीय और थाई नागरिक शामिल होते हैं।

इस मंदिर के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1875 में भारत की यात्रा से लौटने के बाद, थाई राजा ‘चुलालोंगकोर्न’ ने मित्रता के प्रतीक के रूप में मंदिर को कांच के दीपकों का एक सेट उपहार में दिया था।

निष्कर्ष: सीमाओं से परे एक आध्यात्मिक संगम

मरिअम्मन मंदिर की गलियों में चलते हुए आपको ऐसे कई थाई चेहरे मिलेंगे, जिनकी रगों में तमिल पूर्वजों का खून है। जब वे थाई शैली में घुटने टेककर हिंदू देवताओं के सामने झुकते हैं और अपने माथे पर लाल ‘पोट्टू’ (तिलक) लगाकर बाहर निकलते हैं, तो यह अहसास होता है कि संस्कृति और विचार सीमाओं के मोहताज नहीं होते।

यह मंदिर उस दौर की याद दिलाता है जब एशिया में विचार और आस्था बिना पासपोर्ट और पहचान पत्र के स्वतंत्र रूप से बहते थे। आज यह सिलोम की व्यस्त सड़कों के बीच शांति और समन्वय का एक ऐसा टापू है, जहाँ इतिहास और आधुनिकता एक साथ प्रार्थना करते हैं।

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