विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप के पर्दे के पीछे की कहानी / अनामी शरण बबल

 नयी दिल्ली। विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप खेल खत्म हो चुका है। मैरीकॉम और सोनिया चहल के शानदार प्रदर्शन से मेजबानी का अनोखा मौक़ा यादगार  भी हो गया। चैंपियनशिप समाप्त हो चुका है इसके बावजूद इसके पीछे का खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। भारत सरकार की दृढ़ता से कोस़ोबा गणराज्य की भागीदारी को भारत ने दो टूक मना  कर दिया। इसके लिए विश्व की तमाम ताकतों और किसी मुस्लिम खेल के भावी  आयोजनों से मना किए जाने की धमकी के बावजूद भारत अडिग रहा। भारत की तरफ से कोसोबो के झंडे को मान्यता देने की बजाय सर्बिया के बैनर तले भाग लेने पर ही वीज़ा जारी करने का भरोसा दिया गया। भारत सरकार के इस रवैये से ढेरों देशों की नाराज़गी बरकरार है। जिसे समय रहते दूर करने की पहल की जाएगी।
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 मालूम हो कि इस विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में  कोसोवो की एक मुक्केबाज भी भाग लेना चाहती थी। जिसके लिए तमाम देशों ने भारत पर भारी दवाब भी बनाया। एक खिलाड़ी को मान्यता देना कोई बड़ी बात नहीं थी, इसके बावजूद भारत ने कोसोवो के झंडे को नकार दिया। सर्बिया के अधीन भारत में खेलने की शर्त रखी जिसको नकार दिया गया और कोसोवो की एक मुक्केबाज को भारत आने का मौका नहीं मिला। गहराई से पड़ताल किए बगैर देखे तो भारत सरकार के इस  खेल विरोधी नजरिये से बड़ा क्षोभ सा भी होगा। किसी को भी लग सकता है कि एक देश को आखिरकार क्यों रोका जा रहा है।  ज्यादातर भारतीयों को भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति असंतोष हो सकता है कि एक छोटे-से अनाम देश के लिए इतनी सख्ती क्यों?
गौरतलब है कि कोसोवो विवाद को जानने-समझने के लिए हमें अतीत में जाना होगा। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद 1945 में सर्बिया गणराज्य का उदय हुआ। मगर 1992 में 27 दिसंबर को स्वतंत्रता दिवस माना जाता है। पूर्ण विश्व में सर्बिया की मान्यता भी है। सर्बिया के घरेलू संघर्ष हिंसा के बाद 2008 में कोसोवो एक स्वघोषित गणराज्य की तरह एक स्वतंत्र देश मान लिया गया। जिसे अमरीका और साथी देशों ने फ़ौरन मान्यता भी दे दी। मगर रूस समेत ब्रिक्स देशों ने कोसोवो की मान्यता को नकार दिया है। सर्बिया का यह एक विवादित क्षेत्र है। यहां की करीब 95% आबादी मुस्लिमों की होने के बावजूद ज्यादातर मुस्लिम देशों ने भी इसे नहीं स्वीकारा है।     सूत्रों के अनुसार भारतीय सीमा के अधीन जम्मू कश्मीर क्षेत्र भी पाकिस्तान द्वारा एक विवादित इलाकाई बताया जाता रहा है। इसकी संभुता को लेकर भी पाकिस्तान लगातार इसे अपना विवादित इलाका मानता है। भारत सरकार द्वारा कोसोवो को मान्यता देने के बाद जम्मू-कश्मीर को लेकर भी आतंकवादी ताकतों को बल मिलता। और चीन पाकिस्तान सहित कुछ देशों की ओर से मान्यता देने के बाद यह इलाका भी भविष्य में स्वायत राष्ट्र का चेहरा लें सकता था।
 पूर्व जनरल के एस बरार की किताब के अनुसार 1984 में आपरेशन ब्लू स्टार के पीछे की कहानी भी कुछ इसी तरह की थी। जब खुफिया सूत्रों ने स्वायत खालिस्तान के गठन की पूरी कहानी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सभी तथय़ों के साथ दी गती।  सारी सूचना पाने के बाद पीएम श्री मती गांधी ने आनन में फौज को अमृतसर रवाना कर दिया। आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान गुरूद्वारा  स्वर्ण मंदिर में सेना घुसी और तथाकथित खालिस्तान समर्थक सभी नेताओं को मार गिराया गया। और उस समय का विचाराधीन खालिस्तान की योजना खत्म हो गयी। इस घटनाक्रम के 32-34  सालों के बाद कनाडा में सक्रिय खालिस्तान समर्थक ताकतें  सिर फिर सिर उठा रहीं हैं। खालिस्तान समर्थकों की सक्रियता के बाद पंजाब के इस इलाके को भी विवादित करनें की कोशिश ज़ारी है। इस तरह कोसोवो को मान्यता देने से दुनिया भर की ताकतों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खारिज कर दिया। तमाम भावी आशंकाओं से निपटने का हौसला दिखाया।
औरअब देखना है कि मैरीकॉम के तीखे प्रहार को तो लोग भूल जाएंगे। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकके के प्रभाव और दूरगामी परिणाम का असर आने वाले समय में ही पता चलेगा। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अडिग फ़ैसले को ज्यादातर भारतीय जब  जानेंगे तो सहसा उनको अपने यकीन करना  मुश्किल होगा।
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